Thursday, November 4, 2010

साधना काल में ध्यान रखने योग्य बातें

कोई भी साधना श्रद्धा और निष्ठापूर्वक करनी चाहिए. कुछ प्रमुख तथ्य जिनका ध्यान साधना काल में अवश्य रखना चाहिए , इस प्रकार है -
१- अनुष्ठान शुभ दिन , शुभ पर्व  और शुभ मुहूर्त में करना चाहिए .
२- जाप करते समय मुख की  दिशा का निर्धारण गुरु के आदेश अनुसार करे क्योकि कार्य के निमित्त और मंत्र के प्रकार से दिशा का निर्धारण होता है . सामान्यतः मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए .
३- स्वच्छ वस्त्र धारण करे .
४- आसन ऊन का हो तो उत्तम होता है .
५- जाप करते समय दीपक निरंतर प्रज्ज्वलित रहना चाहिए.
६- ब्रह्मचर्य का पूर्णतया पालन करें.
७- सात्विक भोजन करें.
८- असत्य ना बोलें.
९ - मंत्र का उच्चारण सही करे. मानसिक जाप श्रेष्ट होता है .
१०- मन को शांत और पूर्ण एकाग्र रखें.

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Sunday, October 24, 2010

दीपावली प़र पूजा करने की विधि

पूजन हेतु श्री  लक्ष्मी और श्री गणेश की मूर्ति, शिवलिंग , श्री यन्त्र 

पूजन सामग्री - कलावा , १ नारियल , १ नारियल गरी, कच्चे चावल , लाल कपडा , फूल , १५ सुपारी , लौंग , १३  पान के पत्ते , घी , ५- ७ आम के पत्ते , कलश, चौकी , समिधा , हवन कुण्ड, हवन सामग्री , कमल गट्टे, पंचामृत ( दूध, दही , घी , शहद , गंगाजल ), फल , मेवे , मिठाई ,पूजा में बैठने हेतु आसन, आटा, हल्दी , अगरबत्ती , कुमकुम , इत्र, १ बड़ा दीपक , रूई

१. पूजा करने के लिए उत्तर अथवा पूर्व दिशा में मुख होना चाहिए.  पूजा की जगह को अच्छे से साफ़ करे . द्वार प़र रंगोली बनाये .
पूजन करने की जगह प़र आटे और रोली  से अष्टदल कमल और स्वस्तिक बनाये. उसके ऊपर  चौकी रखकर लाल कपडा बिछाएं. कलश में जल भर कर उसमे गंगाजल, थोड़े से चावल और सिक्का डाले . चौकी के दायीं तरफ चावल के ऊपर इस कलश की स्थापना करें. आम के ५ अथवा ७ पत्ते रखें . नारियल प़र तीन चक्र कलावा बांधकर कलश के ऊपर स्थापित करें. 

२. चतुर्मुखी दीपक जलाएं . यह दीपक सम्पूर्ण दीवाली की रात्रि जलना चाहिए . अगरबत्ती जलाये . कलश और दीपक प़र 
हल्दी , कुमकुम और फूल चढ़ाएं .

३- श्री गणेश , देवी लक्ष्मी, शिवलिंग  और श्री यन्त्र  की चौकी प़र पूरे मनोयोग से स्थापना करे. 

४ - सर्वप्रथम अपने गुरु का ध्यान करे. तत्पश्चात  पूजन आरम्भ करें .  एक दूसरे को तिलक लगा कर कलावा बांधे. स्त्रियाँ अपने बाये हाथ एवं पुरुष अपने दायें हाथ प़र बांधें .

५ - गणेश जी का ध्यान  और आह्वाहन  करे. इसके उपरांत उन्हें चावल ,पान , सुपारी , लौंग , फूल  कलावा रुपी वस्त्र , धूप फल और भोग समर्पित करे . नवग्रह  ( सूर्य , चन्द्र , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , शनि , राहू, केतु ), कुबेर  देवता , स्थान  देवता  और  वास्तु  देवता  का क्रम से आह्वाहन कर सभी का पूजन व सम्मान पान, चावल, सुपारी, लौंग, कलावा, फूल , फल धूप  और भोग समर्पित कर करे  . 

६ - अब मन को पूरी तरह एकाग्र कर के भगवान शंकर तत्पश्चात भगवती देवी लक्ष्मी का आह्वाहन और पंचामृत से स्नान कराने उपरोक्त बताई हुई विधि के अनुसार पूजन और स्थापना करे . भगवान् शंकर का पूजन इस मंत्र के साथ करें 
“ ॐ  त्र्यम्बकं  यजामहे सुगंधिम  पुष्टि -वर्धनम
उर्वारुकमिव  बन्धनात मृत्योर  मुक्षीय  मामृतात "

७ - “ ॐ  महा लक्ष्मये नमः ” मंत्र का जाप अथवा श्री सूक्त का जाप करे 

८  - अंत में हवन करे . हवन सामग्री में घी मिला ले . हवन कुण्ड की पूजा करे और क्रमवार सभी देवताओ के नाम का हवन करे जिन्हें अपने आमंत्रित किया है . लक्ष्मी जी के मंत्र से  हवन करते समय कमलगट्टे के बीज हवन सामग्री में मिला ले और १०८ बार मंत्र का उच्चारण करते हुए हवन करे .

९ -  पूर्णाहुति के लिए नारियल गरी को काट कर उसमे बची हुई हवन सामग्री पूरी भर ले और परिवार के सभी सदस्य अपना हाथ लगाकर अंतिम आहुति दे .

१०- लक्ष्मी और गणेश जी की आरती करे .

श्री  गणेश  आरती

जय  गणेश  जय  गणेश , जय  गणेश  देवा
माता  जाकी  पारवती , पिता  महादेवा .
एक  दन्त  दयावंत , चार  भुजा  धारी
माथे  सिंदूर  सोहे , मुसे  की  सवारी , जय
गणेश ...
अंधन  को  आंख  देत , कोढ़िन को  काया
बंझंन को  पुत्र  देत , निर्धन  को  माया , जय
गणेश ...
पान चढ़े , फूल  चढ़े , और  चढ़े  मेवा
लड्डू  का  भोग  लगे , संत  करे  सेवा , जय
गणेश ....
जय  गणेश , जय  गणेश , जय  गणेश  देवा ,
माता  जाकी  पारवती  , पिता  महादेवा

 महालक्ष्मी  आरती 

ॐ  जय  लक्ष्मी  माता , मैया  जय लक्ष्मी  माता ,
तुमको  निस  दिन  सेवत , हरी , विष्णु  धाता
ॐ  जय  लक्ष्मी  माता
उमा  रमा ब्रह्मानी , तुम  हो  जग  माता ,
मैया , तुम  हो  जग  माता ,
सूर्य  चंद्रमा  ध्यावत , नारद  ऋषि  गाता .
ॐ  जय  लक्ष्मी  माता .
दुर्गा  रूप  निरंजनी , सुख  सम्पति  दाता,
मैया  सुख  सम्पति  दाता
जो  कोई  तुमको  ध्याता , रिद्धी सिद्धी  धन  पाता
ॐ  जय  लक्ष्मी  माता .
जिस  घर  में  तुम  रहती , सब   सदगुण आता ,
मैया  सब  सुख  है  आता ,
ताप  पाप  मिट  जाता , मन  नहीं  घबराता .
ॐ  जय  लक्ष्मी  माता
धुप  दीप  फल  मेवा , माँ  स्वीकार  करो ,
ज्ञान  प्रकाश  करो  माँ , मोह अज्ञान  हरो .
ॐ  जय  लक्ष्मी  माता .
महा  लक्ष्मी जी  की  आरती , निस  दिन  जो  गावे
मैया  निस  दिन  जो  गावे ,
दुःख  जावे , सुख  आवे , अति  आनंद   पावे .
ॐ  जय  लक्ष्मी  माता .

११ - श्रद्धा और भक्ति के साथ नमन करते हुए प्रार्थना करे के माता रानी आपके घर में प्रसन्नता के साथ सदा निवास करे .

१२ - दीपावली के अगले दिन ही पूजा का सामान हटाये और बहते पानी में विसर्जित करें .

                                सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये 

                                                       " महामाई सर्वदा कल्याण करे"
                                                             राजगुरु राजकुमार शर्मा 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें  - http://www.bagulamukhijyotishtantra.com/
राजगुरु  राजकुमार  शर्मा                                            +91 11 26366804 (11 AM to 4 PM IST)
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Saturday, October 23, 2010

२०१० दीवाली पूजा का मुहूर्त

तारीख - ५ - नवम्बर २०१०
दिन - शुक्रवार
प्रदोष काल - १७ . ३३ - २०. ०१ सायं
निशीथ काल - २०. १२ से २२. ५१ तक सायं
महा निशीथ काल - २२:५१ से १: ३० तक

करणीय कार्य - 
प्रदोष काल मे मंदिर मे दीप दान , रंगोली और पूजा की पूर्ण तयारी कर लेनी चाहिए. इसी  समय मे  मिठाई वितरण कार्य भी संपन्न कर लेना चाहिए. द्वार प़र स्वस्तिक और शुभ लाभ का सिन्दूर से निर्माण भी इसी समय करना चाहिए .
 निशीथ काल मे मंत्र जाप , विधि विधान से धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन , गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए.
महानिशीथ काल में इष्ट देव का ध्यान , गुरु मंत्र का जाप और तंत्र साधना करनी चाहिए.

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Thursday, October 21, 2010

पंचांग

पंचांग के पांच अंग होते है - तिथि , वार , नक्षत्र , योग और  करण 

१ . तिथि  - तिथि का मान चन्द्रमा की गति प़र आधारित होता है .चन्द्रमा की एक कला को तिथि कहते है. तिथिया कुल ३० होती है. शुक्ल पक्ष मे १५ और कृष्ण पक्ष की १५ तिथिया होती है . शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को अमावस्या कहते है. 
तिथियों की उपादेयता को ध्यान मे रखकर इन्हें नंदा , भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा तिथियों मे बांटा गया है .

२ . वार - हर नए वार का प्रारंभ सूर्योदय के साथ होता है . सृष्टि  के आरंभ मे सूर्य सर्व प्रथम दिखाई देने के करण प्रथम होरा और वार सूर्य के नाम प़र है. इस तरह क्रमवार सात वार है . रविवार, सोमवार,  मंगलवार, बुधवार , गुरुवार शुक्रवार और शनिवार .

३  नक्षत्र - तारो की  विशेष आकृति के आधार प़र नक्षत्रो के नाम रखे गए है. नक्षत्रो की संख्या अनेक है किन्तु ज्योतिष विज्ञानं मे २७ नक्षत्रो के महत्त्व को विशेष स्वीकार गया है .जिनके नाम यहाँ प़र है 
http://rare-facts-in-spirituality.blogspot.com/2010/10/blog-post_17.हटमल

४ . योग - वार और नक्षत्र के योग से २८ योग बनते है . सूर्य और चन्द्र को संयुक्त रूप से १३ अंश और २० कला पूरा करने मे जितना समय लगता है उसे योग कहते है .

५ . करण -  तिथि के आधे भाग को करण कहते है . यह ११ है - बव, बालव, कौलव, तैतिल , गर , वणिज , विष्टि, शकुनी , चतुष्पद , नाग और किन्स्तुघ्न

विवाह, भूमि , वाहन इत्यादि  के क्रय विक्रय एवं गृह प्रवेश आदि के मुहूर्त यहाँ जाने - http://www.bagulamukhijyotishtantra.com/




Sunday, October 17, 2010

नक्षत्र के चरण अनुसार वर्णाक्षर


किसी भी बच्चे के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है वही उसका जन्म नक्षत्र होता है . उसी नक्षत्र के चरण अनुसार बच्चे का नाम रखा जाता है . नक्षत्रो के चरण हिंदी वर्णमाला के अनुसार ही व्यक्त किये जाते है.

क्र सं       नक्षत्र                वर्ण 
1 अश्विनी  (मेष ) चू, चे, चो , ला 
2 भरनी  ली , लू , ले , लो 
3 कृतिका  अ  (वृष) इ , ऊ . ऐ
4 रोहिणी  ओ , व , वि , वू 
5 मृगशिर वे , वो , (मिथुन ) का ,की 
6 आर्द्रा कू, घ , छ
7 पुनर्वसु  के , को , ह  (कर्क ) हि
 8  पुष्य   हु , हे, हो, डा
 9  अश्लेषा  डी, डु, डे, ड़ो
 10  मघा  (सिंह ) म़ा, मी , मू, मे
 11  पूर्व फाल्गुनी   मो, टा, टी, टू
 12  उत्तरफाल्गुनी   टे (कन्या) टा, टी , टू
 13  हस्त   पू , ष, ण, ठ
 14  चित्रा  पे , पो , (तुला ) रा , री
 15  स्वाति   रू, रे , रो  ता
 16   विशाखा   ती, तू, ते (वृश्चिक ), तो
 17  अनुराधा   ना , नी , नू , ने
 18  ज्येष्ठा  नो , या , यी , यू
 19  मूल  (धनु ) ये , यो , भा , भी
 20  पूर्व आषाढ़   भू , ध, फ , ढ
 21  उत्तराषाढ़   भे (मकर) भो , जा , जी
 22  श्रवण   खी , खू , खे , खो
 23  धनिष्ठा  ग  , गी  (कुम्भ) गू , गे
 24  शतभिषा  गो  , सा , सी , सू
 25  पूर्वभाद्रपद   से , सो , दा (मीन ) दी
 26  उत्तरभाद्रपद   दू , थ, झ
 27  रेवती   दे, दो, चा, ची

अभिजीत नक्षत्र के लिए चरनाक्षर है - जू , जे , जो , खा

अपने  बालक अथवा बालिका के नामकरण  और राशि जानने के लिए यहाँ आये -
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Saturday, October 16, 2010

जनम कुंडली में द्वादश भाव

१- लगन - जनम के समय उदय होने वाली राशी जातक का प्रतिनिधित्व करती है. यह भाव व्यक्ति के व्यक्तित्व और प्रवृत्ति के बारे में पूर्ण ज्ञान देता है.
२- द्वितीय भाव - इस भाव को कुटुंब भाव भी कहते है.इससे पैत्रिक संपत्ति का भी ज्ञान होता है.
३- तृतीय भाव - धनोपार्जन के लिए व्यक्ति को स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है. यह जातक के पराक्रम के विषय में ज्ञान देता है.  इससे साहस, वाणी, छोटे  भाई बहिन और प्राथमिक विद्या का भी पता चलता है.
४- चतुर्थ भाव - यह माता पिता , धन संपत्ति, वाहन आदि का प्रतिनिधित्व करता है
५- पंचम भाव - शिक्षा, संतान और संबंधो की जानकारी मिलती है.
६- षष्ठ भाव - यह रोग , शत्रु अधीनस्थ कर्मचारी और कर्ज के विषय में ज्ञान देता है
७- सप्तम भाव- जीवन साथी , साझेदारी में कार्य, विदेश यात्रा और व्यापर का अनुमान देता है.
८- अष्टम भाव - पैत्रिक संपत्ति, आयु , जीवन में होने वाले नुकसान और अन्य दुर्घटनाओ के बारे में सचेत करता है.
९- नवं भाव- इसे धर्म और भाग्य भाव भी कहते है.
१०- दशम भाव - यह कर्म भाव के नाम से भी जाना जाता है. व्यक्ति के व्यवसाय विशेष का निर्धारण इसी भाव से किया जाता है .
११- एकादश भाव - सभी तरह के लाभों का ज्ञान इस भाव से किया जाता है.
१२- द्वादश भाव- इसको व्यय भाव भी कहते है. इससे व्यक्ति के अंतिम पलों का भी ज्ञान होता है इसलिए इसे मोक्ष स्थान भी कहते है.

अपनी  कुंडली  के विश्लेषण के लिए अपनी जन्म  तिथि , जनम समय और जन्म स्थान की जानकारी यहाँ दे -
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ग्रहों की मूल त्रिकोण और स्व राशी


मूल  त्रिकोण 
स्वराशी 
  गृह   राशी   अंश   राशी   अंश 
  सूर्य   सिंह   २०    सिंह   १० 
  चन्द्र   वृषभ   २७    कर्क   ३० 
  मंगल   मेष   १२    मेष   १८ 
  बुध   कन्या   १५  – २०    कन्या   २०  – ३० 
  गुरु   धनु   १०    धनु   २० 
  शुक्र   तुला   १५    तुला   १५ 
  शनि   कुम्भ   २०    कुम्भ   १० 


Monday, October 4, 2010

गृहो का ग़ोचर फल (Gochar Grah Shubh Bhav Chakram)


गोचर का अर्थ -
गोचर का शाब्दिक अर्थ है ग्रहों का विचरण.सभी नवग्रह अपनी अपनी गति के अनुसार भिन्न भिन्न राशियों में भ्रमण करते है. इसके कारण जो प्रभाव राशियों प़र पड़ता है उसे गोचर विचार कहते है.

गोचर कुंडली और जन्म कुंडली में अंतर -

गोचर कुंडली में गृह की राशी परिवर्तित होती रहती है और भाव भी स्थिर नहीं रहता है अतः यह बदलती रहती है.  जनम कुंडली में  भाव और राशी स्थिर रहते है इसलिए जन्म कुंडली स्थिर रहती है.  इसके अलावा गोचर में चन्द्र लगन की प्रधानता है जबकि जन्म कुंडली में सूर्य, चन्द्र एवं लग्न तीनो का विश्लेषण किया जाता है.

गोचर ज्योतिष का उपयोग -
इसका उपयोग जातक के जीवन में विशेष कालावधि में परिणाम जानने के लिए किया जाता है. यह सत्य एवं शुद्ध फल कहने की एक रीति है . गोचर विचार के बिना जन्म कुंडली का फल कथन पूर्णतया सही नहीं किया जा सकता .

गोचर ग्रहों का द्वादश भावो में फल -

शुभ (Shubh) – Good Results
भाव (Bhav) - House
X - Bad Results





भाव


गोचर गृह


सूर्य

चन्द्र

मंगल

बुध

गुरु

शुक्र

शनि

राहू/
केतु

प्रथम

X

शुभ

X

X

X
 X


X

X

द्वितीय

X

X

X

शुभ

शुभ

शुभ

X

X

तृतीय

शुभ

शुभ

शुभ

X

X

शुभ

शुभ

शुभ

चतुर्थ

X

X

X

शुभ

X

शुभ

X

X

पंचम

X

X

X

X

शुभ

शुभ

XX

X

षष्ठ

शुभ

शुभ

शुभ

शुभ

X

X

शुभ

शुभ

सप्तम

XX

शुभ

X

X

शुभ

X

X

X

अष्टम

X

X

X

शुभ

X

शुभ

X

X

नवं 

X

X

X

X

शुभ

शुभ

X

X

दशम

शुभ

शुभ

X

शुभ

X

X

X

X

एकादश 

शुभ

शुभ

शुभ

शुभ

शुभ

शुभ

शुभ

शुभ

द्वादश

X

X

X

X

X

शुभ

X

X

प्रत्येक गृह के मार्गी , वक्री , उदय, अस्त शीघ्री अथवा मंदी होने का प्रभाव फल कथन प़र पड़ता है. गोचर फल कहते समय जन्म कुंडली का का भी विचार करना चाहिए. उदाहरण के लिए जो गृह जन्म कुंडली में अशुभ भाव में स्थित हो या नीच राशी में हो  वह गृह गोचर में शुभ भाव में स्थित होने प़र भी शुभ फल नहीं करेगा.


अपना शुभ अशुभ समय जानने के लिए अपने जन्म का विवरण यहाँ दे -





Friday, September 3, 2010

S. No
RASHI NAKSHATRA CHARAN CHAKRA NAKSHATRA CHARNAKSHAR
1.
MESH ASHVI, BHAR, KRITI 1 CHARAN CHU, CHE, CHO LA, LEE, LU, LE, LO, A
2. VRISH KRITI. 3 CHARAN, ROH, MRIG 2 CHARAN IE, OO, E, O, VA, VEE, VOO, VE, VO
3. MITHUN MRIG 2 CHARAN, AARDRA, PURN 3 CHARAN KA, KI, KU, GH, D, CHH, KE, KO, HA
4. KARK PURN. 4WA CHARAN, PUSHYA, AASHLESHA HI, HU, HE, HO, DA, DI, DU, DE, DO
5.
SINGH MAGHA, PUPHA., UPHA. 1 CHARAN MA, MEE, MU, ME, MO, TA, TI, TOO, TE
6. KANYA UPHA. 3 CHARAN, HAST, CHITRA 2 TO, PA, PEE, POO, SH, NA, TH, PE, PO
7. TULA CHITRA 2 CHARAN, SWA., VISHA. 3 RA, REE, ROO, RE, RO, TA, TI, TU, TE
8. VRISHCHIK VISHA. 4WA, ANU., JYESHTHA TO, NA, NI, NU, NE, YO, YA, YI, YU
9. DHANU MULA, PUSHA, USHA. 1 YA, YO, BHA, BHI, BHA, DHA, PHA, DH, BHE
10. MAKAR USHA. ANTIM 3, SHRAV, DHANI 2 BHO, JA, JI, KHI, KHU, KHE, KHO, GA, GI
11. KUMBH DHANI. 2 SHAT., PUBHA 3 GU, GE, GO, SA, SI, SU, SE, SO, DA
12. MEEN PUBHA. 4WA, UBHA. REV. DI, DU, THA, GHA, TRA, DE, DO, CHA, CHI
AGNI TATVA Mesh Singh Dhanu
PRITHVI TATVA Vrish Kanya Makar
VAYU TATVA Mithun Tula Kumbh
JAL TATVA Kark Vrishchik Meen

Nakshatra - GRAH- Dasha varsh



ASHWANI - KETU (DRAGON TAIL) - 7 YEARS

BHARNI - SHUKRA (VENUS) - 20 YEARS

KRITIKA - SURYA (SUN) - 6 YEARS

ROHINI - CHANDRA (MOON) - 10 YEARS

MRIGSHIRA- MANGAL (MARS) - 7 YEARS

AADRA - RAHU (DRAGON HEAD) - 18 YEARS

PUNARVASU- GURU (JUPITER) - 16 YEARS

PUSHYA - SHANI (SATURN) - 19 YEARS

AASHLESHA - BUDH (MERCURY) - 17 YEARS

MAGHA - KETU (DRAGON TAIL) - 7 YEARS

PURV FALGUNI- SHUKRA (VENUS) - 20 YEARS

UTTAR FALGUNI -SURYA (SUN) - 6 YEARS

HAST - CHANDRA (MOON) - 10 YEARS

CHITRA - MANGAL (MARS) - 7 YEARS

SWATI - RAHU (DRAGON HEAD) - 18 YEAR

VISHAKHA- GURU (JUPITER) - 16 YEARS

ANURADHA - SHANI (SATURN) - 19 YEARS

JYESHTHA - BUDH (MERCURY) - 17 YEARS

MOOLA - KETU (DRAGON TAIL) - 7 YEARS

PURVASHADHA - SHUKRA (VENUS) - 20 YEARS

UTTRASHADHA - SURYA (SUN) - 7 YEARS

SHRAVAN - CHANDRA (MOON) - 10 YEARS

DHANISHTHA - MANGAL (MARS) - 7 YEARS

SHATBHISHA - RAHU (DRAGON HEAD) - 18 YEARS

PURVABHADRAPAD - GURU (JUPITER) - 16 YEARS

UTTARBHADRAPAD - SHANI (SATURN) - 19 YEARS

REWTI- BUDH (MERCURY) - 17 YEARS

************************************************************



अश्वनी - केतु (ड्रॅगन टेल) - 7 वर्ष 

भरणी - शुकरा (वीनस) - 20 वर्ष 

कृतिका - सूर्य (सुन) - 6 वर्ष 

रोहिणी - चन्‍द्रा (मून) - 10 वर्ष 

मृगशिरा- मंगल (मार्स) - 7 वर्ष 

आद्रा - राहू (ड्रॅगन हेड) - 18 वर्ष 

पुनर्वसु- गुरु (जूपिटर) - 16 वर्ष 

पुष्य - शनी (सॅटर्न) - 19 वर्ष 

आश्लेषा - बुध (मर्क्युरी) - 17 वर्ष 

मघा - केतु (ड्रॅगन टेल) - 7 वर्ष 

पूर्व फाल्गुनी- शुकरा (वीनस) - 20 वर्ष 

उत्तर फाल्गुनी -सूर्य  - 6 वर्ष 

हॅस्ट - चन्‍द्रमा  (मून) - 10 वर्ष 

चित्रा - मंगल (मार्स) - 7 वर्ष 

स्वाती - राहू (ड्रॅगन हेड) - 18 वर्ष 

विशाखा- गुरु (जूपिटर) - 16 वर्ष 

अनुराधा - शनी (सॅटर्न) - 19 वर्ष 

ज्येष्ठा - बुध (मर्क्युरी) - 17 वर्ष 

मूला - केतु (ड्रॅगन टेल) - 7 वर्ष 

पूर्वाषाढ़ा - शुक्र  (वीनस) - 20 वर्ष 

उत्तराषाढ़ा - सूर्य (सुन) - 7 वर्ष 

श्रावण - चन्‍द्रा (मून) - 10 वर्ष 

धनिष्ठा - मंगल (मार्स) - 7 वर्ष 

शतभिषा - राहू (ड्रॅगन हेड) - 18 वर्ष 

पूर्वाभाद्रपद - गुरु (जूपिटर) - 16 वर्ष 

उत्तर्भाद्रपद - शनी (सॅटर्न) - 19 वर्ष 

रेवती- बुध (मर्क्युरी) - 17 वर्ष 
TWENTY SEVEN (27) NAKSHATRO KE NAAM AND TARA SANKHYA
क्रम -  हिंदी नाम - अंग्रेजी नाम - फ़ारसी नाम- तारा संख्या 
 
1 -  अश्विनी -  BETA ARIETIS -  SHARTI - 3
2 -  BHARNI 41 ARIETIS BARTAAN 3
3 KRITIKA BETA TAURI SURAIYA 7
4 ROHINI ALDEBARAN (ALFA TAURI) DAWRA 5
5 MRIGSHIR LAMBDA ORIONIS HAKUA 3
6 ADRA GAMMA GEMINORUM (ALFA ORIONIS) HANJHA 1
7 PUNARVASU POLLUX CASTOR (BETA POLLUX) JHIRA 4
8 PUSHYA DELTA CANCRI NASRA 3
9 AASHLESHA ZETA HYDRAE TURFA 5
10 MAGHA REGULUS JAWHA 5
11 PURVAFALGUNI DELTA LEONIS JHAHERA 2
12 UTTRA FALGUNI DENEBOLA SAPHA 2
13 HAST DELTA CORVI AWA 5
14 CHITRA SPICA SAMAAK 1
15 SWATI ARCTURUS GAPHARA 1
16 VISHAKHA ALPHA LIBRAE GHAWA 4
17 ANURADHA DELTA SCORPII AKALI 4
18 JYESHTHA ANTARES CALB 3
19 MOOLA LAMBADA SOLA 11
20 PURVASHADA DELTA SAGITARII NAAA 2
21 UTTRASHADA PHI SAGITTARI VALDA 2
21(ii) ABHIJIT VEGA JHAVE 3
22 SHRAVAN ALTAIR VALAA 3
23 DHANISHTHA ALPHA DELPHINUS SOUD 4
24 SHATBHISHA LAMBADA AQUARII AKHAVA 100
25 PURVABHADRAPAD MARKAB MUKAI 2
26 UTTARBHADRAPAD ALGENIB MUARAB 2
27 REWTI ZETA PISCIUM RISHA 32
ANSHO KE ANUSAR TITHIYO KA KARMSHUKL PAKSH KI TITHIYA
TITHI KARM NAAM TITHI SURYANSH SE CHANDRA KI DOORI
1 PRATIPADA 0 ANSH SE 12 ANSH TAK
2 DWITYA 12 ANSH SE 240 TAK
3 TRITAYA 24 ANSH SE 36 TAK
4 CHATURTHI 36 ANSH SE 48 TAK
5 PANCHMI 48 ANSH SE 60 TAK
6 SHASHTHI 60 ANSH SE 72 TAK
7 SAPTMI 72 ANSH SE 84 TAK
8 ASHTAMI 84 ANSH SE 96 TAK
9 NAVMI 96 ANSH SE 1080 TAK
10 DASHMI 108 ANSH SE 120 TAK
11 EKADASHI 120 ANSH SE 132 TAK
12 DWADASHI 132 ANSH SE 144 TaK
13 TRAYODASHI 144 ANSH SE 156 TAK
14 CHATURDASHI 156 ANSH SE 168 TAK
15 PURNIMA 168 ANSH SE 1800 TAK

Sunday, May 2, 2010

Desires and Life

The essential way to live

There are four velours or goals which have to be achieved by each individual soul. The Valour means desire which one should aim in a systemic way. The other meaning of velour is the fruit achieved after lot of hard labor. These are Dharma, Arth, Kaam and Moksha.

Dharma- Practising Dharma is the supreme method for improving the quality of our human life. The word "dharma" originates from the Sanskrit root dhri, meaning to "uphold" or to "sustain." means "that which upholds or sustains the positive order of things. The Karmas that bring purity into your being is Dharma. The Karmas become Dharma when our chitta is pure. Pure intellect is only possible when there is element of divinity associated with it and this is only achieved with the shuddha Buddhi. When the intellect controls the mind, then that intellect is of the highest grade Dharma is found where there is pure intellect which in turn is associated with detachment & sound judgment. (Vivek)

Arth – This is desired by everyone. No one in this world work without any aim and behind every aim there is desire of benefit, comfort and welfare. The ultimate aim of every human soul is to achieve the highest pleasure. An ordinary man feels that one can get happiness if all the materialistic things are achieved with money. Whatever we do is centered on only money. Arth never stays inside; it is always outside. But the happineess lies inside. The thing which is outside can't bring happiness. Even if it does than it is for moment.

The third valour is Kaam which is associated with situation, person or material things.
This stays in our mind because after achieving our desirable, whether it is situation, person or thing or material. This is definitely better than Arth because to get this; Arth can be spend by any one like anything. But chance of loosing the direction is very high if not guided properly on time. It is a double edge sword.

When Arth & Kaam are not associated with the Dharma then they create the illusion of pleasure. We must understand and implement Arth & Kaam in such a way that momentary pleasure which later leads to sorrow, should not happen.
Whatever prevents blind attraction & attachment that is Dharma. Obeying the Dharma brings brightness & enlightenment to the mind & shoul, People who do not follow their Dharma can never have this aura

We usually concentrate on the Arth & Kaam aspects of purushartha & forget about Moksha & Dharma or leave it on future. If we leave Arth & Kaam in hands of God & concentrate all the energies on achieving Moksha & Dharma than everything else falls into place automatically.
One can not restrain totally or run away from this world. Than what one should do? One should practice Dharma, Arth & Karma equally. Concentrating only on one is what causes man’s downfall. So Balance is the key word. If Arth & Kaam are imbibed with Dharma as the medium, than the Kaam will not lead to any ties and so the path of liberation will open up.

The way of life has been divided in to four stages to prepare one for achievement of these goals in a systematic manner so one can enjoy the life in totality. These are brahmacharya, grihastha, vanaprastha and sanyas ashram. These four stages also help in balancing the three Gunas (satv, raj, tam)

The brahmacharya ashram (stage of studentship) is for initial 20-25 years in which the knowledge of Dharma and other aspects like livelihood, politics etc are learned in a diligent and focused manner to make life better under strict discipline, celibacy and guidance This is the best time to sow the seed of good sanskara on which rest of three ashram matures.
The second 20-25 years, is called the "Grihastha ashram" or householder phase. This is the main time for marriage,having children and raising a family, as well as for working and fulfilling our duties to society. It involves earning a living through the skills acquired during Brahmacharya ashram. In this ashrama an individual pays three debts (service of God, serving sages and saints and to ancestors), The goal is to acquire knowledge, build character and learn to shoulder responsibilities on the basis of dharma.
The third section of 20-25 yr is Vanaprastha or the hermitage phase indicates the departure gradual withdrawal from material possessions & active life handing over the control to the next generationand. In this one begins devoting more time to study of scriptures, contemplation and meditation. The social activities become religious in nature. Celibacy is again recommended.

The fourth and last section is the "Sannyasa" or renunciation phase. In this phase one has to give up all worldly ties, spends all of his or her time in meditation and inwardly aims to seek the highest bliss of spirituality.

Simply reading a topic from a book is not enough. It should stay with one. If any wants to understand its true meaning, then one should successfully imbibe the meaning of the topic read in one’s daily life.

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Wednesday, March 3, 2010

Holi

Festivals are classified into two Main Categories mainly for celebration -

1. One is related with the Celebration of Great incarnation of Lord and Saints.
2. Other festivals relate to the change of the season e.g. Basant Panchami, Makar Sakranti,

Through the festival we are made aware of the change in nature, so that we can live in harmony.
Holi is the festival of colours, romance and triumph of good over evil. In some Bhakti traditions such as Sufism Basant Panchmi stats the Creator and Holi celebrates the meeting of soul and creator.

The reference of Holi is found in Narda Puran, Bhavishya Puran and Jamini Purvamimansa sutra
Holi welcomes the spring and celebration of new life and energy of the season.

Holi is also known as Rang Panchami, Holikotsav, Vasant Mahotsav, Kam Mahotsav. Holi is also a tribute to mother earth for heavy provided us with food and nurturing. It is celebrated on full moon day in the Phalgun month

The legend behind celeberation of Holi -

* The most famous is the Prahalad, who was saved from burning by holika by Lord Narayan. King Hiranyakashyap was angry at his son Prahlad’s devotion to Vihnu and made several attempts to kill him but failed. Finally he decided to make prahlad sat on his sister Holika’s lap who had bestowal that Fire will not burn her.He thought in this way he will kill Prahlad and Holika would remain unharmed. Prahlad’s firm faith on God Vishnu enables him to emerge safe from terrible fire while Holika is reduced to ashes.

This story establishes the victory of positive forces over negative and inspires one to celebrate and respect positive forces in nature. Holi strong the beliefs that true devotees of God emerge safe in difficult circumstances and evil people are punished. It is not all that simple though and one needs to harbor spiritual quality for self development and emulate the attritubes of Prahalad.

* Victory over Dhundhi Ogress by children in kingdom of Prithu

* In memory of caper played by Krishana to adjust the injustice of skin colour- Radha was so fair and Krishna was so dark.Mata Yashoda suggested to splesh the colours on Radha’s face to make her complexion like Krishna.

* Lord Krishana killed Putna that day.

* In memory of reincarnation of Kamdeva - Kamdeva is considered as God of Love. He is distroyed in to ashes when he tried to disrupt Lord Shiva Penance for the Marriege with Devi Parvati on request of Indra and other Devas for the destruction of Tarkasur. This happened on the day of Holika Dahan. When Rati (wife of Kamdeva) prayed Lord Shiva, he restored him as a mental image. This story signifies the burning of carnal desires and presents spiritual state of Love rather than physical lust..

* Birthday of Chaitanya Maha Prabhu - He is a significant form of Radha and Lord Krishana combined in one


Holi Bonfire signifies devotion and knowledge which burns away the mind's impurities like egoism lust, selfishness, greed, hatred and undesirable tendencies by decomposing the Raja and Tama Particals in the atmosphare . Elemination of negative energies helps in acquiring divine attributes of Love laughter and joy through play of colours because the colors work like generators of energy.

It is also said that this bonfire destroyes the bacterias which are responsible for illness due to change in season.

We are all influenced by the different vibrations that each colour possesses.Colours represent the outward expression of our deepest emotions. Colors are manifestation of cosmic powers.
Colour attract the divine energies and activate the five elements. "The seven colors of the rainbow are associated with the seven chakras (energy centers) of our body,"
Each colour in the spectrum vibrates at its own rate and these vibrations correspond with the body's inner vibration. Each part of the body resonates to a different colour. That is the reason colours are used to harmonize vibrations and restore equilibrium. Our sages understood the importance of colour therapy many years back and incorporated it in our culture for improvement of every individual socially as well as spiritually.

Whatever is the reason and method of celebrating Holi, it is certainly a good time for introspection, a time to burn the Holika (carnal desires and impurities of the mind) hiding within to ashes through the fire of devotion and knowledge, so that we can find out the truth and finally lead to Divinity. This festival also keep the people socially linked and spread the happiness and love.

To know more
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Thursday, February 18, 2010

Gem Stone



Ruby - Manikya or ruby, is a red sapphire and often regarded as the king of gems or ratnaraj. It is a very brilliant, hard, durable and wearable stone.
Manikya or ruby balances Surya (sun). Surya represents the king of the solar system in Jyotish. It also represents authority, power, Self, father, body, health, devotion, happiness, healing, beauty, love, passion, integrity and friendship. It makes a person bold and courageous and eliminates depression. It enhances name and fame. It also evokes warmth, inspiration, prosperity, high energy and leadership ability. Ruby will protect one from ill health and grant success in administrative fields, freedom from enemies, debts and diseases. It ensures a long life and promotes independence.
It helps to cure peptic ulcer, fever, rheumatism, gout.
Depending on the placement of Surya in your birth chart, the wearing of a ruby may be very auspicious in strengthening the positive influences of Surya.

Pearl - Mukta or pearl is the most valued of the organic gems. A pearl is a very special and exclusive gift of nature considered universally as the oldest known gem.
Pearl represents the queen in Jyotish. The pearl is often called the "queen of the sea". Chandra, the moon, occupies a central role in the solar system and influences the seasonal, monthly and daily cycles and rhythms in our physiology.
The pearl harmonizes the moon which directly influences emotions, mind, affluence, and public. Wearing a pearl can bring harmony and stability to these influences so one gets freedom from mental disturbances. This is an excellent gem for meditation. It inspires purity, honesty, innocence, integrity, concentration, meditation and tranquility. Pearl gives happiness from mother, good memory, success in educational fields and ensures good health, long life and improves finances.
It is prescribed for deficiency of calcium, heart diseases, diabetes, gastric disorders, breathing troubles, uterine disorders, eye diseases, hysteria, lung disorders, pleurisy, insanity and other mental diseases.

Red coral - It is also known as Vidruma . This is stone for Mangal which is like a general with its focus on precision and power in activity. Mars is responsible for the field of activity, energy, courage, ambition, sports, property, strength, commander, technical ability, mechanical, forcefulness creativity, passion, wisdom, enthusiasm and bravery.
A red coral removes obstacles and averts accidents. In financial matters, it grants land and property, and makes him debt free. Its use also helps in removing impediments that could be delaying one's marriage. It nullifies Kuja dosha and promotes marriage. It also bestows good health, longevity, name, fame children, intelligence, good fortune, domestic harmony, success in professional life and happiness. It saves one from natural calamities like thunder, floods and fires It cures all kinds of mental diseases, physical diseases and difficulties. Woman with history of abortion can wear this for successful delivery after in depth analysis.

Emerald- Emerald harmonizes and strengthens the positive influences of Budh or mercury. It is also known as Marakata . Mercury is the "prince" in Jyotish and is influenced by Surya and Chandra.
It promotes love, romance, joy, memory, faith, intelligence, education, speech, teaching, learning, communication, confidence, writing, drawing, trade, humor, wit, discrimination, diplomacy, intellect, wealth, longevity, prosperity, domestic happiness, advancement in profession, name, fame and an obstruction free life.
Emeralds promises good luck and enhances well being. It institutes psychic powers.
In medical terminology, it is good for general health, nervous system. It shields the native from poisonous snakes and envious persons. It cures eye diseases, controls B.P. and nervous disorders and turns enemies into friends.

Yellow sapphire - Pushparaga or yellow sapphire harmonizes and benefits Guru or Jupiter. Guru is the major instructor or teacher and influences action with the highest order and balance. It symbolizes universal. Guru guides action in the most harmonious and uplifting manner and balances inner and outer input while simultaneously performing and monitoring action.
It signifies knowledge, wisdom, virtue, fortune, justice, education, future, religion, philosophy, intellect, devotion, children, distant travel, spirituality, truthfulness, prosperity, love, affection, spiritual knowledge and charity. It is very helpful for progeny and child birth. It is excellent in financial matters and business stability.
It will bless the native with good children. It also acts as a protective charm. Those who find obstruction in the progress of their educational field, or those who suffer losses from property matters should wear Yellow Sapphire for removal of their difficulties.
In medical astrology, it is prescribed for calcium deficiency, heart diseases, insanity and mental diseases

Diamond- Venous represents luxuries, romance, partnership wealth, beauty, arts, comforts, jewelry, happiness, and vehicles. Being the representative of planet venous it can bless the native with children, happiness, intelligence, name, fame, happy married life, possession of jewelry and ornaments, rich dress, conveyances, comfortable house abundant wealth and success in all ventures. It drives away evil spirits and bad effects of evil eyes.
It cures the diseases of kidney and reproductive organs. It also enhances sexual power, cures diabetes, diseases of urine and venereal diseases, skin and uterine diseases.

Blue sapphire - Blue sapphire or Neelam is used to harmonize the effect of Saturn. Shani or Saturn represents longevity, discipline, authority, ambition, leadership, honesty, perfection, humility, elders, denial, delays, misery, adversity, accidents, conservatism and dutifulness. Its role is often symbolized as a servant. Its influence is often seen as restrictive or obstructive yet its influence also seeks to bring balance.
The word sapphire means beloved pattern. The blue sapphire carries blue ray on harmony, nourishing the mind giving perfective and putting the thought in order. It also increases mental flexibility and health and individual achieve master of the self mind, body and spirit. Sapphire is about clearing and focusing the mind which is the key to soul growth.
It provides good servants, happiness, prosperity, name, fame, land, good luck, building and properties, advancement in profession and favors from government. It bestows good health and success in all ventures. It also ensures success in politics. One could become either a King or a great scholar by wearing Blue Sapphire.
It protects danger while travelling and eases mental unrest and various forms of madness. It also protects the wearer from all sorts of evil spirits, spells, black magic, witch craft and prevents fear.
BLUE SAPPHIRE is a healing GEM stone; it heals all kinds of wounds. It also cures all sorts of diseases and makes the wearer vital and strong.

Gomed - Gomedhaka or Hessonite Garnet represents Rahu, the ascending node of the moon. Its natural significations include worldly desires, worldly benefits, laziness, gratification, and ignorance. It is by nature unpredictable and creates sudden changes and influences, rigidity and passion. It is similar to Shani or Saturn in its nature and influence.
Use of Gomeda will bestow good health, good education and ensures improvement in the profession. It cures diseases, gives knowledge and intelligence. The adverse effects caused by evil also vanish. One gets quite active by wearing Gomeda and gets promotion in the service and profits in business. It can give unexpected wealth to its wearer. The enmity of relatives disappears and ensure victory over enemies.
It cures diseases caused by affliction of Rahu and Saturn. It also increase appetite, vitality and confers good health. . It ensures sound sleep and gives peace of mind.

Cats eye - Vaidurya or Cat's Eye harmonizes Ketu which is traditionally known as the "tail of the dragon". In Jyotish, Ketu is the descending node of Chandra (Moon). Its influences are similar to Mangal or Mars. The gemstone builds determination, strength of mind, steadfastness, will power, courage, vigor, self-control, intelligence and knowledge. It grants philosophical disposition and activity of the mind like asceticism, non-attachment, healing, moksha, enlightenment, wisdom and that which is hidden.
This is a quick action Gem. It ensures victory over enemies and protection from enemies. By wearing a Cat's eye one is be attracted by others.. The native gets name, fame and wealth. He becomes calm and his anger disappears. He receives the help of relatives and friends. It works successfully in getting back the loan money too. It ensures the welfare of children. Childless person may be blessed with children. It ensures quick marriage.
It protects from accidents, pimples and skin diseases.

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